मैं..... हूँ?
चुभ जाए शूल कभी पाँवों में, उफ़ संग निकल पड़ता हूँ, पीर दे रही हो किर्च कहीं, नैनों की कोर से मैं झड़ता हूँ, विकार, ग़ुबार के अनंत भँवर, चलते रहें निरंतर भीतर, अविरल गंगा यमुना सा बहूँ या, बूँद में सिमट पड़ता हूँ।
Literature
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Jun 2026 4:32 PM
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